वाराणसी। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के अजनाला शहीदों की पहचान और उनके वंशजों की खोज को लेकर चल रहे वैज्ञानिक प्रयासों को नई दिशा मिली है। गुरुवार को काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की ज्ञान लैब में तमिलनाडु के कृष्णगिरी जिले के सन्थूर गांव से पहुंचे चार लोगों ने स्वेच्छा से अपने डीएनए (सलाइवा) सैंपल दिए। इन सैंपलों की तुलना अजनाला से मिले प्राचीन डीएनए प्रोफाइल से की जाएगी, ताकि यह पता लगाया जा सके कि उनका संबंध 1857 के उन शहीदों से है या नहीं।

इतिहास के अनुसार, 1 अगस्त 1857 को पंजाब के अजनाला स्थित कालियानवाला कुएं में ब्रिटिश सेना ने 26वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री के विद्रोही सैनिकों की निर्मम हत्या कर उनके शव कुएं में फेंक दिए थे। वर्ष 2012 में इतिहासकार सुरेंद्र कोचर के नेतृत्व में हुई खुदाई में मानव कंकाल, गोलियां, एपॉलेट और ईस्ट इंडिया कंपनी के सिक्के बरामद हुए, जिससे इस ऐतिहासिक घटना की पुष्टि हुई।

इसके बाद भारतीय वैज्ञानिकों की टीम, जिसमें प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे, डॉ. नीरज राय, डॉ. के. थंगराज और डॉ. जे.एस. सेहरावत शामिल रहे, ने दांतों और हड्डियों से डीएनए और स्टेबल आइसोटोप विश्लेषण किया। अध्ययन में सामने आया कि ये सैनिक पंजाब के नहीं, बल्कि गंगा के मैदानी क्षेत्रों, विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार से संबंधित थे।

शोध के दौरान यह भी जानकारी सामने आई कि अजनाला कांड के बाद ब्रिटिश शासन ने शहीद सैनिकों के परिवारों पर दमन शुरू कर दिया था। गिरफ्तारी और उत्पीड़न से बचने के लिए कई परिवार उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के दुमताहर गांव से दक्षिण भारत के तमिलनाडु पहुंचकर बस गए। इन्हीं परिवारों में पांडे परिवार भी शामिल बताया जाता है, जो वर्तमान में सन्थूर गांव में रहता है। पारिवारिक परंपरा के अनुसार, उनके पूर्वज 1857 के बाद यहां आकर बसे थे।

इस खोज को आगे बढ़ाने में कनाडा में रहने वाले समीर पांडे की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने अपने पारिवारिक इतिहास की जानकारी प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे की टीम को दी। इसके बाद वैज्ञानिकों ने ब्रिटिश अभिलेखों से जानकारी जुटाने का प्रयास किया, लेकिन कोई ठोस रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हो सका।

 

फिलहाल वैज्ञानिकों ने अजनाला के 50 शहीदों का माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए डेटा तैयार कर लिया है और अब अधिक सटीक पहचान के लिए न्यूक्लियर डीएनए विश्लेषण पर काम चल रहा है। इसी प्रक्रिया के तहत सन्थूर से आए चार परिवारजनों के डीएनए सैंपल लिए गए हैं। यदि इनका मिलान सफल होता है, तो लगभग 169 वर्ष बाद अजनाला के शहीदों की पारिवारिक पहचान स्थापित करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित हो सकती है।

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