रिपोर्ट / ओमकार नाथ

वाराणसी। काशी में भगवान जगन्नाथ की पारंपरिक डोली यात्रा बुधवार को श्रद्धा, आस्था और उल्लास के साथ निकाली गई। अनवसर (स्वास्थ्य लाभ) की अवधि पूर्ण होने के बाद भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र के साथ भक्तों के बीच विराजमान हुए। इस अवसर पर मंदिर परिसर में आयोजित डोली यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। पूरे परिसर में “हर-हर महादेव” और “जय जगन्नाथ” के जयघोष गूंजते रहे, जिससे वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया।

दोपहर बाद मंदिर के पट खुलने पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का विशेष श्रृंगार किया गया। रंग-बिरंगे फूलों से सजी आकर्षक डोली में तीनों विग्रहों को विराजमान कराया गया। इसके बाद शंखध्वनि, डमरू, नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के बीच डोली यात्रा मंदिर परिसर से निकाली गई।

श्रद्धालुओं ने भगवान की डोली को अपने कंधों पर उठाकर गर्भगृह की परिक्रमा कराई और प्रभु के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।जैसे ही भगवान की डोली मंदिर परिसर से बाहर निकली, श्रद्धालुओं ने फूलों की वर्षा कर भव्य स्वागत किया। महिलाओं, युवाओं, बच्चों और बुजुर्गों ने पूरे उत्साह के साथ यात्रा में भाग लिया। भक्तों का विश्वास है कि भगवान की डोली को कंधा देने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

डोली यात्रा खोजवां स्थित संकुलधारा पहुंची, जहां मंदिर के पुजारी राधेश्याम पांडेय ने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और आरती कराई। धार्मिक अनुष्ठान के बाद डोली पुनः मंदिर लौटी, जहां संध्या आरती के उपरांत मंदिर के पट बंद कर दिए गए।

यात्रा के दौरान डमरू दल के कलाकारों ने पारंपरिक वादन से श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। डमरू और नगाड़ों की गूंज पर भक्त जयकारे लगाते हुए भगवान की भक्ति में सराबोर नजर आए। पूरे मार्ग पर धार्मिक उल्लास का अद्भुत वातावरण देखने को मिला।

 

सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी थी। दर्शन के लिए लंबी कतारें लगी रहीं। कई श्रद्धालु इस दिव्य क्षण को अपने मोबाइल कैमरों में कैद करते दिखाई दिए। श्रद्धालुओं ने बताया कि वे हर वर्ष इस डोली यात्रा का बेसब्री से इंतजार करते हैं और इसमें शामिल होना अपने जीवन का सौभाग्य मानते हैं।

मंदिर के पुजारी राधेश्याम पांडेय ने बताया कि आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा को भगवान जगन्नाथ की डोली यात्रा निकालने की परंपरा सदियों पुरानी है। पूर्व वर्षों में यह यात्रा अस्सी स्थित मंदिर से विभिन्न मार्गों से होते हुए रथयात्रा स्थित बेनीराम बाग तक पहुंचती थी, जहां अगले दिन से काशी का ऐतिहासिक रथयात्रा मेला प्रारंभ होता था।

उन्होंने बताया कि इस वर्ष भी धार्मिक परंपराओं का विधिवत पालन किया गया। साथ ही जानकारी दी कि गुरुवार सुबह 5:15 बजे से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के दर्शन पुनः शुरू होंगे।

भगवान जगन्नाथ की डोली यात्रा में उमड़ी श्रद्धा, भक्ति और उत्साह ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि काशी में भगवान जगन्नाथ के प्रति लोगों की आस्था आज भी उतनी ही गहरी और अटूट है, जितनी सदियों से चली आ रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *