दुर्गा सप्तशती के पाठ और हवन के साथ संपन्न हुआ पूजन, श्रद्धालुओं ने यज्ञशाला की परिक्रमा कर मां का आशीर्वाद लिया
वाराणसी। श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज के पावन सानिध्य में चल रहे श्री सहस्त्र चंडी महायज्ञ के 13वें दिन विधि-विधान से पूजन-अर्चन किया गया। यज्ञशाला में गौरी-गणेश पूजन, यज्ञ के स्तंभों का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ, हवन और वेदियों के पूजन के साथ विशेष रूप से प्रचंडा योगिनी की आराधना की गई। मंत्रोच्चार और वैदिक विधियों के बीच हुए पूजन से यज्ञशाला का वातावरण भक्तिमय बना रहा।
13वें दिन का पूजन एवं पाठ सपत्नीक डॉ. इंजीनियर विनय मिश्रा और मीरजापुर निवासी डॉ. सच्चिदानन्द तिवारी द्वारा संपन्न कराया गया। पूजन के दौरान दुर्गा सप्तशती का पाठ और हवन किया गया। इसके बाद आरती के साथ आज के अनुष्ठान का समापन हुआ। यज्ञशाला में प्रतिदिन हो रहे पूजन, जप और हवन में क्षेत्रीय सनातन धर्मावलंबी भी शामिल होकर धार्मिक अनुष्ठान का पुण्य लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
प्रचंडा योगिनी की हुई विशेष आराधना
महायज्ञ के 13वें दिन प्रचंडा योगिनी की विशेष पूजा की गई। सनातन और तांत्रिक परंपराओं में प्रचंडा योगिनी को चौंसठ योगिनियों में एक उग्र एवं शक्तिशाली देवी के रूप में माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार योगिनी स्वरूप शक्ति और ऊर्जा के विभिन्न रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनकी आराधना विशेष रूप से शक्ति, सुरक्षा, सिद्धि और बाधाओं के निवारण से जुड़ी मानी जाती है।

प्रचंडा योगिनी की पूजा के दौरान दुर्गा सप्तशती के मंत्रों का पाठ किया गया। हवन में आहुतियां अर्पित की गईं और मां की आरती की गई। यज्ञशाला में मौजूद श्रद्धालुओं ने भी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना में सहभागिता की।
रक्तबीज के वध से जुड़ी है योगिनी परंपरा
धार्मिक मान्यता के अनुसार रक्तबीज नामक राक्षस के अत्याचारों से देवता परेशान थे। उसके विनाश के लिए देवी शक्ति का आह्वान किया गया। इसके बाद देवी दुर्गा और रक्तबीज के बीच भयंकर युद्ध हुआ। रक्तबीज को वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की जो भी बूंद धरती पर गिरती, उससे उसी के समान एक नया राक्षस उत्पन्न हो जाता था।
रक्तबीज के इस वरदान के कारण उसका वध कठिन हो गया। मान्यता है कि इसी दौरान देवी की शक्ति विभिन्न रूपों में प्रकट हुई, जिन्हें योगिनी कहा गया। युद्ध के दौरान रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले रक्त को धरती पर गिरने से रोकने के लिए योगिनियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रकार अंततः रक्तबीज का वध किया गया।

इसी धार्मिक परंपरा से चौंसठ योगिनियों की आराधना और उनके मंदिरों की परंपरा को जोड़ा जाता है। सनातन परंपरा में योगिनियों के पूजन का विशेष महत्व माना गया है।
यज्ञशाला की परिक्रमा कर श्रद्धालुओं ने लिया आशीर्वाद
महायज्ञ में शामिल श्रद्धालु प्रतिदिन यज्ञशाला की परिक्रमा कर रहे हैं। इसी क्रम में डॉ. देवानन्द जी ने अपनी माताजी और भ्राता के साथ यज्ञशाला की परिक्रमा की और धार्मिक अनुष्ठान में सहभागिता की। क्षेत्रीय सनातन धर्मावलंबियों ने भी यज्ञशाला की परिक्रमा कर मां का आशीर्वाद लिया।

यज्ञ स्थल पर सुबह से ही श्रद्धालुओं का पहुंचना जारी रहा। मंत्रोच्चार, हवन और आरती के दौरान पूरा वातावरण भक्तिमय नजर आया। आयोजकों के अनुसार प्रतिदिन होने वाले पूजन, जप और हवन से यज्ञशाला में आध्यात्मिक वातावरण बना हुआ है।
महायज्ञ में लगातार बढ़ रही श्रद्धालुओं की सहभागिता
श्री सहस्त्र चंडी महायज्ञ के दौरान अलग-अलग धार्मिक विधियों और देवी स्वरूपों की आराधना की जा रही है। महायज्ञ में शामिल श्रद्धालु पूजन-अर्चन के साथ यज्ञशाला की परिक्रमा कर रहे हैं। आयोजकों का कहना है कि यज्ञ और देवी आराधना के इस क्रम में बड़ी संख्या में सनातन धर्मावलंबी श्रद्धा के साथ सहभागिता कर रहे हैं।

इस अवसर पर डॉ. विनय मिश्रा, स्वामी वज्रभूषणानन्द सरस्वती, डॉ. सच्चिदानन्द तिवारी, प्रियव्रत तिवारी, त्रिभुवन सिंह, पीयूष दीक्षित, बेचू मौर्य, आशुतोष उपाध्याय, विनोद त्रिपाठी, मिथिलेश शुक्ला सहित अन्य श्रद्धालुओं ने भी यज्ञशाला की परिक्रमा कर मां का आशीर्वाद लिया।
महायज्ञ के 13वें दिन हुए विशेष पूजन में प्रचंडा योगिनी की आराधना, दुर्गा सप्तशती पाठ, हवन और आरती प्रमुख रहे। वैदिक मंत्रों और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच श्रद्धालुओं ने मां की आराधना कर सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना की।
