35 वर्षों से चित्रकला साधना में जुटे कलाकार विजय कुमार, भगवान गणेश की भक्ति को बनाया जीवन का संकल्प

स्पेशल रिपोर्ट / ओमकार नाथ

वाराणसी। काशी में भक्ति और कला का रिश्ता सदियों पुराना है। यहां आराधना के अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं। कोई संगीत के जरिए अपने आराध्य को याद करता है तो कोई मूर्ति, चित्रकला या अन्य कलाओं के माध्यम से ईश्वर की साधना करता है। इसी परंपरा को अपनी अनोखी चित्रकला के जरिए आगे बढ़ा रहे हैं अस्सी क्षेत्र निवासी प्रसिद्ध चित्रकार एवं मूर्तिकार विजय कुमार। भगवान गणेश के अनन्य भक्त विजय कुमार की खासियत यह है कि वह आंखों पर पट्टी बांधकर महज कुछ सेकंड में भगवान गणेश की आकृति कागज या कैनवास पर उकेर देते हैं।

गणेश पूजा और गणेश महोत्सव के दौरान जब काशी के मंदिरों और घरों में विघ्नहर्ता की पूजा-अर्चना होती है, उस समय विजय कुमार के लिए चित्रकला ही गणपति की आराधना बन जाती है। आंखों पर पट्टी बांधकर वह मन ही मन भगवान गणेश के मंत्र का जाप करते हैं और ध्यान में अपने आराध्य की छवि को रखते हुए कैनवास पर उनकी आकृति बनाना शुरू कर देते हैं। देखने वालों के लिए उनका यह हुनर किसी आश्चर्य से कम नहीं होता।

आंखों पर पट्टी, हाथों में ब्रश और मन में गणपति

विजय कुमार के अनुसार उनके लिए चित्रकारी सिर्फ एक कला नहीं है, बल्कि यह उनकी साधना का हिस्सा है। भगवान गणेश का चित्र बनाते समय वह अपना पूरा ध्यान अपने आराध्य पर केंद्रित करते हैं। उनका कहना है कि आंखों के सामने गणेश की प्रतिमा न हो, तब भी मन में बसी उनकी छवि के आधार पर आकृति को कागज पर उतारा जा सकता है।

 कलाकार विजय कुमार

विजय बताते हैं कि सामान्य तौर पर एक चित्र तैयार करने में उन्हें एक से दो मिनट तक का समय लग सकता है, लेकिन अभ्यास और एकाग्रता के चलते कई बार वह 20 से 30 सेकंड में भी गणेश की आकृति तैयार कर देते हैं। आंखों पर पट्टी बंधी होने के बावजूद हाथों की गति और रेखाओं पर उनका नियंत्रण देखने लायक होता है। वह अपनी इस क्षमता को व्यक्तिगत उपलब्धि के बजाय भगवान गणेश की कृपा मानते हैं।

बचपन से मूर्ति और चित्रकला से जुड़ा परिवार

विजय कुमार का परिवार कई पीढ़ियों से मूर्ति निर्माण और कला के काम से जुड़ा रहा है। बचपन से ही उन्हें पत्थरों को तराशने और मूर्तियां बनाने का वातावरण मिला। इसी के साथ चित्रकारी के प्रति भी उनकी रुचि बढ़ती गई। शुरुआत में वह सामान्य तरीके से भगवान गणेश और अन्य देवी-देवताओं के चित्र बनाया करते थे।

भगवान गणेश

बाद में एक घटना ने उनकी कला को नया रूप दिया। बताया जाता है कि उनके भतीजे ने एक बार मजाक में उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी और उनसे इसी हालत में चित्र बनाने की चुनौती दी। विजय कुमार ने चुनौती स्वीकार की। शुरुआत में यह उनके लिए प्रयोग था, लेकिन लगातार अभ्यास करते-करते उन्होंने बंद आंखों से आकृति बनाने की अपनी अलग शैली विकसित कर ली।

धीरे-धीरे भगवान गणेश उनके इस प्रयोग के केंद्र में आ गए। गणपति के चित्रों का लगातार अभ्यास करने के बाद वह आंखों पर पट्टी बांधकर भी उनकी आकृति बनाने में दक्ष हो गए। अब यह कला उनके लिए केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि भगवान गणेश की आराधना का माध्यम बन चुकी है।

विजय कुमार

गणेश महोत्सव में 108 चित्र बनाने का संकल्प

गणेश महोत्सव के दौरान विजय कुमार की साधना का विशेष स्वरूप देखने को मिलता है। महोत्सव के पहले दिन वह आंखों पर पट्टी बांधकर भगवान गणेश के 108 चित्र बनाने का संकल्प लेते हैं। चित्र बनाते समय वह गणेश मंत्र का जाप करते हैं और हर चित्र को अपने आराध्य को समर्पित करते हैं।

विजय के अनुसार सनातन परंपरा में 108 संख्या का विशेष महत्व है। जिस तरह भक्त माला के 108 मनकों के जरिए भगवान का स्मरण करते हैं, उसी भाव से वह 108 चित्रों के माध्यम से गणपति का ध्यान करते हैं। उनके लिए यह केवल 108 चित्रों का लक्ष्य पूरा करना नहीं, बल्कि एकाग्रता, साधना और भक्ति की प्रक्रिया है।

काशी के 56 विनायकों की भी बनाई चित्र श्रृंखला

भगवान गणेश के प्रति विजय कुमार की भक्ति केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं है। उन्होंने काशी के विभिन्न प्रसिद्ध मंदिरों में भी चित्र बनाए हैं। इसके अलावा उन्होंने काशी के 56 विनायकों की चित्रकला तैयार की है। काशी में गणेश आराधना की विशेष परंपरा है और यहां अलग-अलग विनायक स्वरूपों की मान्यता है। विजय ने इन्हीं धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को अपनी कला में स्थान देने का प्रयास किया।

उनकी बनाई गणेश चित्र श्रृंखला और अन्य कलाकृतियों की प्रदर्शनी देश के अलग-अलग हिस्सों में लग चुकी है। कला और भक्ति के इस अनूठे मेल के कारण उन्हें विभिन्न मंचों पर सम्मान भी मिला है। उन्हें ‘काशी रत्न’ सम्मान से भी नवाजा जा चुका है।

लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हो चुकी है कला

विजय कुमार की आंखों पर पट्टी बांधकर गणेश चित्र बनाने की कला ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। उनकी कला के लिए उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज हो चुका है। उन्होंने लगातार कई घंटों तक भगवान गणेश की पेंटिंग बनाने का प्रदर्शन किया है।

कलाकार विजय कुमार

उनका कहना है कि रिकॉर्ड या सम्मान उनके लिए महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि भगवान गणेश की भक्ति के साथ अपनी कला को जोड़ पाना है। वह अपनी कला को किसी प्रतियोगिता के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे बप्पा की सेवा मानते हैं।

35 वर्षों से जारी है कला साधना

विजय कुमार के मुताबिक उन्होंने अपने जीवन के करीब 35 वर्ष चित्रकला को समर्पित किए हैं। इस दौरान उन्होंने अलग-अलग तरह की चित्रकला पर काम किया, लेकिन भगवान गणेश उनके लिए हमेशा विशेष रहे। वह बंद आंखों से लाखों से अधिक गणेश पेंटिंग बनाने का दावा करते हैं।

विजय कहते हैं कि चित्र बनाते समय उनके लिए सबसे जरूरी एकाग्रता है। जब मन शांत होता है और ध्यान पूरी तरह गणपति पर केंद्रित रहता है तो हाथ अपने आप रेखाओं को दिशा देने लगते हैं। उनका मानना है कि लगातार अभ्यास ने उनकी इस कला को निखारा है, लेकिन इसके पीछे सबसे बड़ा आधार भगवान गणेश के प्रति उनकी आस्था है।

जब तक बप्पा की इच्छा होगी, चित्रकारी जारी रहेगी’

विजय कुमार कहते हैं कि जीवन में उन्होंने कला को साधना के रूप में अपनाया है और आगे भी इसे जारी रखना चाहते हैं। उनका कहना है कि जब तक बप्पा की इच्छा होगी, तब तक उनकी चित्रकारी और गणेश आराधना का यह सिलसिला चलता रहेगा।

 श्री गणेश

काशी की गलियों में गणेश पूजा के दौरान जहां मंदिरों में घंटियों की आवाज और गणपति के जयकारे सुनाई देते हैं, वहीं विजय कुमार की उंगलियां कैनवास पर भगवान गणेश की आकृति को आकार देती हैं। उनके लिए रंग और रेखाएं केवल चित्र बनाने के साधन नहीं हैं, बल्कि आराध्य के चरणों में अर्पित की जाने वाली कला-अंजलि हैं।

आंखों पर पट्टी बांधकर कुछ ही क्षणों में गणेश की आकृति उकेरने की उनकी कला काशी की उस परंपरा की झलक दिखाती है, जहां भक्ति और कला अलग-अलग नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। विजय कुमार की चित्रकला इसी विश्वास को जीवंत करती है कि जब मन में आराध्य की छवि गहरी हो तो साधना का रास्ता आंखों से नहीं, बल्कि आस्था और एकाग्रता से तय होता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *