रिपोर्ट – पवन आजाद
वाराणसी। ओम्कार नाथ काशी के महाश्मशान पर चिता भस्म के साथ खेली जाने वाली विश्व प्रसिद्ध ‘मसाने की होली’ अब विवादों के घेरे में आ गई है। काशी के विद्वानों की सर्वोच्च संस्था, काशी विद्वत परिषद ने इस आयोजन को शास्त्रों के विरुद्ध और परंपरा का उल्लंघन बताते हुए इस पर कड़ा ऐतराज जताया है। परिषद ने स्पष्ट किया है कि वे इस आयोजन पर रोक लगाने के लिए प्रशासन को पत्र लिखेंगे।
शास्त्रों की मर्यादा और परंपरा पर सवाल
बीएचयू के ज्योतिष विभागाध्यक्ष और काशी विद्वत परिषद के वरिष्ठ सदस्य पंडित विनय पांडेय ने इस विषय पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि श्मशान जैसे वैराग्य के स्थान पर उत्सव मनाना और भीड़ जुटाना धार्मिक मान्यताओं के विपरीत है।
अशास्त्रीय आयोजन: विद्वानों का तर्क है कि हाल के वर्षों में इसे “प्राचीन परंपरा” का नाम देकर बढ़ावा दिया गया है, जबकि शास्त्रों में इसका कोई उल्लेख इस रूप में नहीं मिलता।
मर्यादा का उल्लंघन: पंडित पांडेय के अनुसार, “महाश्मशान भगवान शिव का वह पवित्र स्थान है जो जीवन-मृत्यु का बोध कराता है। वहां युवक-युवतियों का एकत्र होकर उत्सव मनाना काशी की गरिमा को तार-तार करना है।”
पर्यटन और आधुनिकता का बढ़ता प्रभाव
गौरतलब है कि रंगभरी एकादशी के अगले दिन मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर चिता भस्म से होली खेली जाती है। मान्यता रही है कि भगवान शिव अपने गणों के साथ यहाँ होली खेलते हैं।
हालाँकि, परिषद का मानना है कि अब यह श्रद्धा से अधिक पर्यटन आकर्षण और आधुनिक दिखावे का रूप ले चुका है, जिससे श्मशान की शांति और सुचिता भंग हो रही है।
प्रशासनिक दखल की तैयारी
काशी विद्वत परिषद जल्द ही एक औपचारिक बैठक बुलाकर इस मुद्दे पर प्रस्ताव पारित करेगी। इसके बाद जिला प्रशासन को एक मांग पत्र सौंपा जाएगा, जिसमें निम्नलिखित बिंदुओं पर जोर दिया जाएगा:
श्मशान घाट पर इस प्रकार के सार्वजनिक उत्सवों पर तत्काल रोक लगे।
धार्मिक स्थलों की मर्यादा बनाए रखने हेतु कड़े नियम लागू हों।
“काशी विद्वत परिषद इस गतिविधि का पूर्ण विरोध करती है। हम जल्द ही प्रशासन से संपर्क कर इस पर प्रतिबंध लगाने की मांग करेंगे।”
पंडित विनय पांडेय, विद्वान, काशी विद्वत परिषद परंपरा बनाम शास्त्र: एक नई बहस
आयोजकों का पक्ष है कि यह सदियों पुरानी लोक परंपरा है, वहीं विद्वानों की संस्था इसे मर्यादा के विरुद्ध मान रही है। परिषद के इस कड़े रुख के बाद अब काशी में परंपरा और शास्त्र सम्मत व्यवहार को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। अब देखना यह होगा कि वर्ष 2026 की होली पर प्रशासन इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या निर्णय लेता है।
