रिपोर्ट – पवन आजाद
वाराणसी। आधुनिक मूर्तिशिल्प के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके गुरु राम छाटपार के 81वें जन्मदिवस के अवसर पर 19 जनवरी 2026, सोमवार को “राम छाटपार शिल्पन्यास, भारत” द्वारा आयोजित ‘रेत में आकृति की खोज’ कार्यक्रम का 24वाँ वार्षिक संस्करण माँ गंगा के पावन तट पर भव्य रूप से सम्पन्न हुआ। यह एक दिवसीय कार्यशाला प्रातः 10 बजे से सायं 4 बजे तक गंगा तट पर उभरे विस्तृत रेत के टापुओं पर आयोजित की गई।
कार्यक्रम में लगभग 400 से 500 कलाकारों ने भाग लेकर केवल रेत के माध्यम से नवीन, प्रयोगात्मक एवं स्वतंत्र मूर्तिशिल्पों की रचना की। खुली प्रकृति, बहती गंगा की धारा और विस्तृत रेत के मैदान के बीच कलाकारों की उँगलियों से आकार लेती कलाकृतियाँ दर्शकों के लिए रोमांचक और आकर्षण का केंद्र बनी रहीं।
स्थानीय कलाकारों के साथ-साथ काशी हिंदू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ सहित गोरखपुर, आजमगढ़, लखनऊ, इलाहाबाद तथा देश के विभिन्न राज्यों से आए ललित कला के छात्र एवं कलाकारों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। विभिन्न आयु वर्ग और पृष्ठभूमि से आए कलाकार पूरे मनोयोग से अपनी कृतियों में जुटे दिखाई दिए।
36 वर्षों की समृद्ध परंपरा
राम छाटपार शिल्पन्यास की स्थापना वर्ष 1989 में स्वर्गीय गुरु राम छाटपार (आधुनिक मूर्तिशिल्पी एवं काशी हिंदू विश्वविद्यालय के तत्कालीन मूर्तिकला प्राध्यापक) की स्मृति में उनके शिष्यों, मित्रों एवं कलाकारों के सहयोग से की गई थी। शिल्पन्यास के अध्यक्ष पद पर पद्मश्री से सम्मानित स्वर्गीय प्रो. शंखो चौधुरी जैसे वरिष्ठ मूर्तिकार रहे।
गुरु राम छाटपार की कला-साधना और समर्पण से प्रेरित यह संस्था बीते 36 वर्षों से आधुनिक एवं समकालीन मूर्तिकला के विकास हेतु राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों का आयोजन करती आ रही है और कला जगत में अपनी एक सशक्त पहचान बना चुकी है।
कला और समाज का अनोखा संगम
‘रेत में आकृति की खोज’ कार्यक्रम को भारत का एकमात्र ऐसा आयोजन माना जाता है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर की विशेषता रखता है। पिछले 24 वर्षों से यह आयोजन निरंतर वाराणसी के कला-विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। गुरु राम छाटपार के जन्मदिवस पर शुरू हुई यह परंपरा अब गंगा के अन्य तटवर्ती शहरों तक भी फैल चुकी है, जहाँ इसी प्रकार के आयोजनों ने कला को समाज से जोड़ने का कार्य किया है।
कार्यक्रम में कलाकारों ने रेत को कैनवास मानकर वर्ष भर की सामाजिक, राजनीतिक घटनाओं, मानवीय संवेदनाओं, अच्छाइयों-बुराइयों और समकालीन विषयों को अपनी कला में ढाल दिया। किसी ने पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया तो किसी ने सामाजिक समरसता और शांति को रूपायित किया।
दर्शकों को मिली सौंदर्य की अनुभूति

माँ गंगा की लहरों के साथ उभरे रेत के टीलों पर जब एक-के-बाद-एक कलाकृतियाँ आकार लेती गईं, तो दर्शक भी कला-रस से अभिभूत हो उठे। मानवीय संवेदनाओं की इस जीवंत अभिव्यक्ति ने दर्शकों को ठहर कर देखने और सराहना करने को विवश कर दिया।
शहर के कला-प्रेमियों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और प्रतिष्ठित नागरिकों की उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और बढ़ाया।
कलाकारों को सम्मान
हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी चयनित कलाकारों को “राम छाटपार शिल्पन्यास, भारत” की ओर से एक-एक हजार रुपये की नगद पुरस्कार राशि प्रदान कर प्रोत्साहित किया गया।
कार्यक्रम के समापन पर संयोजक कलाकारों एवं आयोजकों ने सभी प्रतिभागियों, सहयोगियों और दर्शकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए आयोजन को सफल बनाने में मिले सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।
