रामनगर दुर्ग के श्यामवर्ण दक्षिणमुखी हनुमान का दरबार, दर्शन को उमड़े श्रद्धालुभोर की आरती के बाद भक्तों ने किया दुर्लभ दर्शन

वाराणसी। धर्म और आस्था की नगरी काशी में रामनगर दुर्ग के दक्षिणी छोर पर विराजमान श्यामवर्ण दक्षिणमुखी हनुमान जी के दर्शन के लिए रविवार, 25 अक्टूबर को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। वर्ष में केवल एक बार आम श्रद्धालुओं के लिए खुलने वाले इस मंदिर का पट खुलते ही भक्तों का पहुंचना शुरू हो गया। भोर से ही दर्शन के लिए लंबी कतारें लग गईं। मंदिर परिसर ‘हर-हर महादेव’ और ‘जय श्रीराम’ के जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने बजरंगबली के दर्शन-पूजन कर परिवार की सुख-समृद्धि और मंगलकामना की प्रार्थना की।

रामनगर दुर्ग स्थित इस प्राचीन मंदिर में दर्शन का अवसर साल में केवल एक बार मिलने के कारण इसका विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इसी वजह से वाराणसी के अलावा आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मंदिर का पट खुलने के साथ ही भक्तों में दर्शन को लेकर उत्साह देखने को मिला। सुबह की आरती के बाद श्रद्धालुओं ने बारी-बारी से हनुमान जी के दर्शन किए। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में सुबह से ही भक्तिमय माहौल बना रहा।

श्रद्धालुओं की भीड़ को व्यवस्थित रखने के लिए पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई। भक्तों को कतारबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा था, ताकि सभी को सुचारु रूप से दर्शन का अवसर मिल सके। वर्ष में एक बार होने वाले इस विशेष दर्शन को लेकर रामनगर में धार्मिक उत्साह देखने को मिला।

अनूठी प्रतिमा और उससे जुड़ी लोकमान्यताएं

रामनगर दुर्ग के दक्षिणी छोर पर स्थापित श्यामवर्ण दक्षिणमुखी हनुमान जी की प्रतिमा अपनी विशिष्ट पहचान के लिए जानी जाती है। प्रतिमा के श्यामवर्ण और दक्षिणमुखी स्वरूप को लेकर श्रद्धालुओं के बीच लंबे समय से धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। मंदिर से जुड़ी लोककथाओं के अनुसार, किले के भीतर जमीन की खोदाई के दौरान यह प्रतिमा प्राप्त हुई थी। इसके बाद काशीराज परिवार की ओर से दुर्ग के दक्षिणी हिस्से में मंदिर का निर्माण कराकर प्रतिमा की स्थापना कराई गई।

हालांकि, प्रतिमा कब और किस परिस्थिति में जमीन के भीतर पहुंची थी, इसे लेकर स्पष्ट ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। यही वजह है कि मंदिर की उत्पत्ति और प्रतिमा के इतिहास को लेकर लोगों में जिज्ञासा बनी रहती है। श्रद्धालु इस स्थान को आस्था के विशेष केंद्र के रूप में देखते हैं और साल में एक बार मिलने वाले दर्शन के अवसर को महत्वपूर्ण मानते हैं।

मंदिर की पहचान केवल इसकी प्राचीनता या प्रतिमा के स्वरूप तक सीमित नहीं है। इससे जुड़ी पौराणिक कथा भी श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित है। लोकमान्यता के अनुसार, यहां विराजमान श्यामवर्ण हनुमान जी की प्रतिमा का संबंध त्रेतायुग में भगवान श्रीराम और रावण के बीच हुए युद्ध के प्रसंग से जोड़ा जाता है। इसी कथा के कारण प्रतिमा के श्यामवर्ण होने को लेकर भी धार्मिक व्याख्या की जाती है।

 भगवान श्रीराम के बाण से जुड़ी है श्यामवर्ण होने की कथा

धार्मिक लोककथा के अनुसार, जब भगवान श्रीराम माता सीता को रावण के चंगुल से मुक्त कराने के लिए लंका जाने की तैयारी कर रहे थे, तब समुद्र पार करने के लिए उन्होंने समुद्र देव से मार्ग देने की प्रार्थना की थी। मान्यता है कि काफी प्रतीक्षा के बाद भी जब समुद्र से मार्ग नहीं मिला, तो भगवान श्रीराम क्रोधित हो गए। उन्होंने समुद्र को सुखाने के उद्देश्य से अपने धनुष पर बाण चढ़ा लिया।

कथा के अनुसार, भगवान श्रीराम के क्रोध को देखकर समुद्र देव प्रकट हुए और उनसे क्षमा मांगते हुए लंका तक पहुंचने का मार्ग निकालने का उपाय बताया। इसके बाद श्रीराम ने धनुष पर चढ़ाए गए बाण को पश्चिम दिशा की ओर छोड़ दिया। इस प्रसंग को लेकर प्रचलित मान्यता है कि बाण के प्रचंड वेग से धरती पर संकट उत्पन्न होने की आशंका थी।

लोककथा में बताया जाता है कि धरती को डोलने से बचाने के लिए हनुमान जी घुटनों के बल बैठ गए। बाण के तेज और प्रभाव से उनका शरीर झुलस गया, जिसके कारण उनका रंग श्यामवर्ण हो गया। श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित इसी कथा को रामनगर दुर्ग में विराजमान श्यामवर्ण हनुमान जी की प्रतिमा से जोड़कर देखा जाता है।

हालांकि, इस कथा को धार्मिक लोकमान्यता के रूप में ही देखा जाना चाहिए। प्रतिमा की उत्पत्ति, उसके श्यामवर्ण होने के कारण और स्थापना से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद यह कथा मंदिर की धार्मिक पहचान और श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी हुई है।

साल में एक दिन दर्शन का अवसर, भक्तों में दिखा उत्साह

रामनगर दुर्ग के इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां आम श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए वर्ष में केवल एक दिन अवसर मिलता है। इसी कारण मंदिर का पट खुलने के दिन भक्तों की आवाजाही बढ़ जाती है। श्रद्धालु सुबह से ही मंदिर पहुंचकर कतार में लग जाते हैं और अपनी बारी आने पर हनुमान जी के दर्शन करते हैं।

दर्शन के दौरान मंदिर परिसर में जयकारों की गूंज सुनाई देती रही। श्रद्धालुओं ने बजरंगबली के सामने शीश झुकाकर पूजा-अर्चना की और अपने परिवार के कल्याण की कामना की। कई भक्तों के लिए यह अवसर विशेष धार्मिक महत्व रखता है, क्योंकि सालभर प्रतीक्षा के बाद उन्हें अपने आराध्य के दर्शन का मौका मिलता है।

रामनगर दुर्ग का ऐतिहासिक परिवेश और मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं इस अवसर को और विशेष बनाती हैं। दक्षिणमुखी स्वरूप और श्यामवर्ण प्रतिमा के कारण मंदिर की अलग पहचान है। प्रतिमा से जुड़ी लोककथाएं भी श्रद्धालुओं के बीच आकर्षण का केंद्र रहती हैं।

 सुरक्षा व्यवस्था के बीच कतारबद्ध होकर हुए दर्शन

मंदिर का पट खुलने के साथ श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए सुरक्षा के इंतजाम किए गए। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में पुलिसकर्मियों की तैनाती रही। पुलिसकर्मी श्रद्धालुओं को कतार में आगे बढ़ाते रहे और एक-एक करके मंदिर में प्रवेश दिलाया गया, जिससे दर्शन-पूजन के दौरान भीड़ को नियंत्रित रखा जा सके।

श्रद्धालुओं की आवाजाही पर नजर रखने के साथ पुलिस बल ने व्यवस्था बनाए रखने में भूमिका निभाई। विशेष दर्शन के दौरान अधिक संख्या में भक्तों के पहुंचने की संभावना को देखते हुए लोगों को व्यवस्थित तरीके से दर्शन कराने पर ध्यान दिया गया।

वर्ष में एक बार खुलने वाले इस मंदिर में दर्शन के अवसर पर रामनगर दुर्ग का वातावरण सुबह से ही भक्तिमय बना रहा। ‘हर-हर महादेव’ और ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष के बीच श्रद्धालुओं ने श्यामवर्ण दक्षिणमुखी हनुमान जी के दर्शन किए। धार्मिक लोकमान्यताओं, प्रतिमा के अनूठे स्वरूप और साल में एक दिन मिलने वाले दर्शन के कारण यह मंदिर रामनगर की विशिष्ट धार्मिक पहचान के रूप में श्रद्धालुओं के बीच महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

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