1993 में बरगद की सूखी जटाओं के पास मिले पूजा के निशान से जुड़ी है मंदिर स्थापना की कहानी, 41 दिन अन्न त्यागकर श्रीसूक्त पाठ और सवा दो लाख परिक्रमा की भी मान्यता
रिपोर्टर : गोपी गुप्ता
वाराणसी। काशी की धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा में मंदिरों और उनसे जुड़ी मान्यताओं का विशेष महत्व है। शहर में स्थित एक महालक्ष्मी मंदिर की स्थापना की कहानी भी आस्था, संकल्प और संघर्ष से जुड़ी बताई जाती है। मंदिर से जुड़े परिवार के अनुसार वर्ष 1993 में स्वर्गीय शिवपूजन जी को स्वप्न में मां महालक्ष्मी के दर्शन हुए थे। परिवार का दावा है कि मां ने उन्हें मंदिर स्थापित करने का आदेश दिया था। इसके बाद लगातार आने वाले स्वप्नों को उन्होंने मां का संकेत मानकर मंदिर निर्माण का संकल्प लिया।
स्वप्न में मिला मंदिर के स्थान का संकेत
परिवार के मुताबिक शिवपूजन जी पत्थर की नक्काशी और हस्तशिल्प के कारोबार से जुड़े थे। मंदिर निर्माण का आदेश मिलने के बाद उन्होंने मां से प्रार्थना की कि यदि मंदिर बनाना है तो उसके स्थान का संकेत भी मां स्वयं दें।
परिवार के अनुसार इसके बाद ब्रह्ममुहूर्त में आए एक स्वप्न में मां महालक्ष्मी उन्हें एक स्थान पर लेकर गईं। वहां एक बरगद का सूखा पेड़ था। परिवार का कहना है कि स्वप्न में मां ने बरगद की जटाओं के पास तीन कपूर जलाकर पूजा की और संकेत दिया कि जिस स्थान पर कपूर जलने के निशान मिलें, वहीं उनकी प्रतिमा स्थापित की जाए।

स्वप्न के बाद शिवपूजन जी ने अपनी पत्नी को पूरी बात बताई। दोनों सुबह करीब चार बजे बताए गए स्थान पर पहुंचे। परिवार के अनुसार बरगद की जटाओं को हटाने पर वहां फूल, अक्षत और तीन कपूर से पूजा किए जाने के निशान मिले। परिवार ने इसे मां महालक्ष्मी का संकेत मानते हुए उसी स्थान पर मंदिर निर्माण का संकल्प लिया।
संकल्प भूले तो बिगड़ी तबीयत, फिर आया मां का स्वप्न
मंदिर परिवार के अनुसार कारोबार के कारण शिवपूजन जी को अक्सर दूसरे शहरों में रहना पड़ता था। इसी दौरान मंदिर निर्माण का संकल्प कुछ समय के लिए उनके मन से दूर हो गया। उस समय वह कारोबार के सिलसिले में कोलकाता में थे।
परिवार का कहना है कि इसी दौरान अचानक उनकी तबीयत खराब हो गई। हालत ऐसी हो गई कि उनके लिए चलना-फिरना भी मुश्किल हो गया। बीमारी के दौरान उन्हें दोबारा मां महालक्ष्मी के दर्शन होने का दावा किया जाता है। परिवार के अनुसार शिवपूजन जी ने मां से क्षमा मांगी और मंदिर निर्माण का संकल्प फिर दोहराया।
परिवार का कहना है कि इसके बाद उनकी तबीयत में सुधार हुआ। कोलकाता से वापस लौटने के बाद उन्होंने मंदिर निर्माण का कार्य शुरू कराया।
विरोध और बाधाओं के बीच पूरा हुआ मंदिर निर्माण
परिवार के अनुसार मंदिर निर्माण और प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा के दौरान कई तरह की बाधाओं और विरोध का सामना करना पड़ा। हालांकि, समय के साथ परिस्थितियां बदलीं और मंदिर का निर्माण पूरा हुआ।
बताया जाता है कि शुरुआती दौर में मंदिर का स्वरूप काफी छोटा था। वर्तमान गर्भगृह के आसपास सीमित स्थान में ही पूजा-अर्चना होती थी। बाद में मंदिर का विस्तार किया गया। मुख्य द्वार पर हाथियों की कलाकृतियां लगाई गईं और धीरे-धीरे मंदिर का वर्तमान स्वरूप विकसित हुआ।
41 दिन अन्न त्यागकर किया श्रीसूक्त का पाठ
मंदिर परिवार के अनुसार प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा के कुछ वर्षों बाद शिवपूजन जी को फिर मां महालक्ष्मी के स्वप्न में दर्शन हुए। परिवार का दावा है कि इस दौरान उन्हें 41 दिनों तक अन्न का त्याग कर श्रीसूक्त का पाठ करने का संकेत मिला।
शिवपूजन जी ने इसे मां का आदेश मानते हुए 41 दिनों तक अन्न त्यागकर श्रीसूक्त का पाठ किया। परिवार के अनुसार पाठ के अंतिम दिनों में एक बुजुर्ग महिला मंदिर में पहुंचीं और पूजा करने की इच्छा जताई। महिला ने मां की प्रतिमा पर फूल और अक्षत चढ़ाए।

परिवार का दावा है कि इसके बाद प्रतिमा के पास दिव्य ज्योति दिखाई दी। जब पीछे मुड़कर देखा गया तो वह महिला वहां मौजूद नहीं थीं। परिवार इसे मां महालक्ष्मी का साक्षात दर्शन मानता है।
सवा दो लाख परिक्रमा की भी मान्यता
मंदिर से जुड़ी मान्यता में मां की सवा दो लाख परिक्रमा का भी उल्लेख मिलता है। परिवार के अनुसार इसके लिए भी शिवपूजन जी को मां की ओर से संकेत मिला था।
बताया जाता है कि सोरहिया मेले के दौरान उन्होंने अन्न का त्याग कर दिन-रात मां की परिक्रमा की। परिवार का दावा है कि इसी दौरान उन्हें मां की ओर से 13 अनमोल वचनों का ज्ञान प्राप्त हुआ। इन वचनों को मंदिर की दीवार पर अंकित किया गया है।
मंदिर परिवार की ओर से श्रद्धालुओं से इन वचनों के भाव को समझने और उन्हें अपने जीवन में उतारने की अपील की जाती है।
श्रद्धालु बताते हैं आस्था और चमत्कार के अनुभव
मंदिर में आने वाले श्रद्धालु भी मां महालक्ष्मी से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हैं। परिवार के अनुसार कई भक्त मंदिर में अपनी मनोकामना लेकर पहुंचते हैं और मनोकामना पूरी होने के बाद मां को श्रृंगार, वस्त्र और पूजन सामग्री अर्पित करते हैं।
परिवार का कहना है कि कुछ श्रद्धालु मां की प्रतिमा के स्वरूप में बदलाव महसूस करने की बात भी बताते हैं। आरती के दौरान श्रद्धा और निर्मल मन से मां के स्वरूप को देखने वाले कुछ भक्त चेहरे पर मुस्कान दिखाई देने का अनुभव बताते हैं।
हालांकि, ये सभी अनुभव श्रद्धालुओं और मंदिर परिवार की आस्था एवं मान्यताओं पर आधारित हैं।
आस्था और संकल्प की कहानी बना मंदिर
मंदिर परिवार के अनुसार इसकी स्थापना से लेकर वर्तमान स्वरूप तक की यात्रा केवल एक मंदिर के निर्माण की कहानी नहीं है, बल्कि मां महालक्ष्मी के प्रति विश्वास, संकल्प और वर्षों से चली आ रही आस्था की कहानी है। 1993 में स्वप्न से शुरू हुई यह मान्यता आज मंदिर से जुड़े परिवार और श्रद्धालुओं के लिए आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुकी है। समय के साथ यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ती जा रही है।
