रिपोर्ट – पवन आजाद 

वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के पत्रकारिता एवं जनसंपर्क विभाग में आयोजित तीन दिवसीय संगोष्ठी के प्रथम दिन की शाम पूरी तरह कविताओं के नाम रही। ‘शब्दों की शक्ति’ से सजी इस काव्य संध्या में देश के प्रतिष्ठित और युवा कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से साहित्य, संवेदना और विचारों का अनूठा संगम प्रस्तुत किया।

“किरदार बौना हो तो खुद्दारी नहीं आती”

कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ द्विवेदी ‘अनूप’ ने की। उन्होंने प्रेम और स्वाभिमान को स्वर देते हुए कहा, “तुम्हारे बाद किसी और को क्या देखेंगे” और खुद्दारी पर चोट करते हुए पढ़ा— “हमेशा रंग बदलने की कलाकारी नहीं आती, अगर किरदार बौना हो तो खुद्दारी नहीं आती।” उनकी इन पंक्तियों ने श्रोताओं को गहराई तक प्रभावित किया।

प्रेम से लेकर जीवन-दर्शन तक का सफर

कवि सम्मेलन में विभिन्न कवियों ने अपनी लेखनी से अलग-अलग रंग बिखेरे:

अंकित: निस्वार्थ प्रेम और त्याग को शब्दों में पिरोया।

दिव्या शुक्ला: प्रेम को प्रकृति के साथ जोड़कर कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति दी।

विभा तिवारी: जीवन के उतार-चढ़ाव और आत्मबल को रेखांकित किया।

धीरेंद्र कुमार पटेल: सकारात्मक सोच और उम्मीद का संदेश दिया।

सुशांत कुमार शर्मा: आधुनिक समय में बदलती भाषा और उपमाओं पर तीखा कटाक्ष किया।

विशेष आकर्षण मातृभाषा सत्र रहा, जहाँ भोजपुरी कविताओं ने माता-पिता और परिवार के प्रति भावनात्मक जुड़ाव को जीवंत कर दिया।

संस्कारों की सीख और सम्मान

अवधूत भगवान राम डिग्री कॉलेज के प्राचार्य एवं कार्यक्रम के उपाध्यक्ष डॉ. अजय विक्रम सिंह ने संस्कारों पर जोर देते हुए पढ़ा— “तेरी परवरिश में आचरण भी थोड़ा शामिल कर, तेरे बच्चे बड़ों के पैर छूना भूल जाते हैं।”

सम्मान समारोह:

कार्यक्रम के अंत में पत्रकारिता विभागाध्यक्ष प्रो. ज्ञान प्रकाश मिश्रा और आयोजन सचिव डॉ. बाला लखेंद्र ने सभी आमंत्रित कवियों को अंगवस्त्र एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। विभाग की ओर से सभी आगंतुकों और कवियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया।

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