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वाराणसी। धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी रविवार को पूरी तरह राममय हो गई। अवसर था श्रीमद्भगद्गुरु रामानन्दाचार्य जी के 726वें प्राकट्य महोत्सव का। इस पावन उपलक्ष्य में काशी की सड़कों पर एक ऐसी दिव्य शोभायात्रा निकली, जिसने भक्ति और सांस्कृतिक वैभव का अनूठा संगम प्रस्तुत किया।
शंखनाद और डमरू की गूंज से गूंजी काशी शोभायात्रा का शुभारंभ प्रसिद्ध अस्सी घाट से हुआ। एक किलोमीटर से भी अधिक लंबी इस यात्रा में “जय श्रीराम” के उद्घोष और शंखनाद ने पूरे वातावरण को भक्तिमय कर दिया।
आकर्षण का केंद्र रहे:
डमरू दल: काशी की पहचान, डमरू दल की थाप ने श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
जीवंत झांकियां: राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती और मां काली के स्वरूपों में कलाकारों के नृत्य ने सड़कों पर देवलोक सा दृश्य उत्पन्न कर दिया।
विशाल जनसमूह: पारंपरिक वेशभूषा में महिलाएं, बटुकों की टोलियां और हजारों की संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।
पुष्पवर्षा के साथ हुआ भव्य स्वागत
अस्सी घाट से शुरू होकर यह यात्रा रविदास गेट, संकट मोचन, मानस मंदिर, दुर्गाकुंड और खोजवा होते हुए श्रीराम मंदिर (गुरुधाम) पर जाकर संपन्न हुई। पूरे मार्ग में स्थानीय लोगों ने संतों और झांकियों पर पुष्पवर्षा की और आरती उतारकर आशीर्वाद लिया।
संत सम्मेलन और समरसता का संदेश
श्रीराम मंदिर पहुंचने पर एक वृहद संत सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस आयोजन का नेतृत्व काशीपीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी डॉ. रामकमलाचार्य वेदान्ती जी महाराज ने किया।
“यह शोभायात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति और श्रीराम भक्ति परंपरा का जीवंत संदेश है। जगद्गुरु रामानन्दाचार्य जी ने भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया और समाज को समरसता का मार्ग दिखाया।”
स्वामी डॉ. रामकमलाचार्य वेदान्ती जी
आयोजन की महत्ता
श्रीरामानन्द विश्वहितकारिणी परिषद् एवं श्री वैष्णव विरक्त संत समाज के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव ने नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और संत परंपरा से जोड़ने का सफल प्रयास किया। संतों ने एक स्वर में कहा कि रामानन्दाचार्य जी का भक्ति आंदोलन आज भी समाज को एकजुट करने की शक्ति रखता है।
