भगवान शिव के निराकार और साकार दोनों स्वरूपों में करते हैं भक्तों का कल्याण : पं. शिवम शुक्ला महाराज
रिपोर्टर: गोपी गुप्ता
वाराणसी। दुर्गाकुंड स्थित एकेएस पैलेस सभागार में चल रही शिव महापुराण कथा के तीसरे दिन गुरुवार को भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया गया। कथा के दौरान कथा व्यास पं. शिवम शुक्ला महाराज ने भगवान शिव के स्वरूप, उनके तप, माता पार्वती की साधना और शिव विवाह से जुड़े प्रसंगों को श्रद्धालुओं के सामने रखा। कथा सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु सभागार में पहुंचे और पूरे भक्तिभाव के साथ शिव महापुराण का श्रवण किया।

कथा व्यास पं. शिवम शुक्ला महाराज ने कहा कि भगवान शिव निराकार और साकार दोनों स्वरूपों में अपने भक्तों का कल्याण करने वाले हैं। वे अनादि, अनंत और आशुतोष हैं। भगवान शिव अपने भक्तों की श्रद्धा और भक्ति से शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं और उन पर अपनी कृपा बरसाते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान शिव का स्वरूप अपने आप में अनेक संदेशों को समेटे हुए है। उनका जीवन त्याग, तपस्या, करुणा और साधना का प्रतीक माना जाता है।

कथा व्यास ने कहा कि भगवान शिव को देवों के देव महादेव और आदि योगी के रूप में जाना जाता है। वे ध्यान और योग के साथ-साथ कला के भी संरक्षक माने जाते हैं। भगवान शिव का स्वरूप एक ओर रुद्र का है, जो अधर्म और असुर शक्तियों का संहार करते हैं, वहीं दूसरी ओर वे भोलेनाथ के रूप में अपने भक्तों के प्रति अत्यंत सरल और करुणामयी हैं।
उन्होंने कहा कि भगवान शिव की आराधना में आडंबर से अधिक भाव और श्रद्धा का महत्व है। सच्चे मन से की गई भक्ति भगवान शिव को प्रिय है। इसी कारण भगवान शिव को भोलेनाथ और आशुतोष कहा जाता है।

शिव महापुराण कथा के दौरान शिव विवाह प्रसंग का वर्णन करते हुए पं. शिवम शुक्ला महाराज ने बताया कि भगवान शिव समाधि में लीन थे। माता पार्वती भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या कर रही थीं। देवताओं की इच्छा थी कि भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हो, जिससे देवकार्य की पूर्ति हो सके।
उन्होंने कथा प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए बताया कि भगवान शिव की समाधि और तपस्या को भंग करने के लिए देवताओं ने कामदेव को आगे किया। कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग करने का प्रयास किया। इससे भगवान शिव क्रोधित हो उठे और उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। भगवान शिव के तीसरे नेत्र से निकली अग्नि से कामदेव भस्म हो गए।
कथा व्यास ने कहा कि इस प्रसंग के माध्यम से भगवान शिव के तप, संयम और योग शक्ति का वर्णन मिलता है। इसके बाद देवताओं ने भगवान शिव की स्तुति की। देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने विवाह के लिए सहमति प्रदान की।

कथा में बताया गया कि भगवान शिव अपने विविध गणों के साथ हिमाचल पहुंचे, जहां माता पार्वती के साथ उनका विवाह संपन्न हुआ। शिव विवाह का प्रसंग सुनते ही कथा पंडाल में मौजूद श्रद्धालु भक्ति भाव में डूब गए। भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह प्रसंग के दौरान वातावरण शिवमय हो गया। श्रद्धालुओं ने भगवान शिव के जयकारे लगाए और कथा का श्रवण किया।
कथा व्यास ने कहा कि शिव और पार्वती का विवाह केवल एक धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि त्याग, साधना, समर्पण और विश्वास का भी प्रतीक है। माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की और अपनी साधना के माध्यम से अपने संकल्प को पूरा किया। वहीं भगवान शिव ने भी माता पार्वती के समर्पण और तपस्या को स्वीकार किया।
शिव महापुराण कथा के तीसरे दिन कार्यक्रम की शुरुआत विधिवत पूजा-अर्चना के साथ हुई। कथा प्रारंभ होने से पहले कौशल्या देवी, अनीता और विनोद सुनेजा ने व्यासपीठ का पूजन किया। इसके बाद कथा व्यास पं. शिवम शुक्ला महाराज ने शिव महापुराण कथा का वाचन शुरू किया।
इस अवसर पर वंश कुमार, सतपाल, राकेश कालरा, राजीव कटारिया सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। कथा के दौरान श्रद्धालुओं ने शांतिपूर्वक भगवान शिव के विवाह प्रसंग को सुना और धार्मिक वातावरण में भक्ति भाव से कथा का आनंद लिया। आयोजन स्थल पर श्रद्धालुओं में कथा को लेकर उत्साह दिखाई दिया। कथा के दौरान भगवान शिव के जयकारों से पूरा सभागार गूंज उठा।
