रिपोर्ट – पवन आजाद 

वाराणसी। काशी में इस वर्ष होलिका दहन को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। फाल्गुन पूर्णिमा पर पड़ रहे चंद्र ग्रहण के कारण शहर में अलग-अलग स्थानों पर दो अलग-अलग तिथियों—2 मार्च और 3 मार्च—को होलिका दहन की तैयारी की गई है। कहीं 2 मार्च की रात होलिका जलाई जाएगी, तो कहीं 3 मार्च को दहन का निर्णय लिया गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चंद्र ग्रहण के प्रभाव और सूतक काल को देखते हुए कुछ विद्वानों ने 2 मार्च को होलिका दहन को उचित बताया है, जबकि अन्य पंचांगों के आधार पर 3 मार्च को दहन का निर्णय लिया गया है। इसी कारण शहर में दोनों तिथियों को लेकर मतभेद की स्थिति बनी हुई है।

दुर्गा मंदिर के पास बनी होलिका आकर्षण का केंद्र

शहर के प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर के पास तैयार की गई भव्य होलिका लोगों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। यहां बाकायदा पंपलेट लगाकर 3 मार्च को होलिका दहन की सूचना दी गई है।

यह होलिका काफी ऊंची और भव्य बनाई गई है। इसे फूल-मालाओं से सजाया गया है और चारों ओर सुरक्षा के लिए घेरा भी बनाया गया है। विशेष बात यह है कि होलिका की गोद में भक्त प्रह्लाद की प्रतिमा भी स्थापित की गई है, जो धार्मिक कथा को सजीव रूप में दर्शा रही है।

सेल्फी और फोटो का बना केंद्र

दुर्गा मंदिर क्षेत्र में बनी इस आकर्षक होलिका को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। युवा और बच्चे यहां फोटो और सेल्फी लेते नजर आ रहे हैं। शाम के समय यहां मेले जैसा माहौल दिखाई दे रहा है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि हर वर्ष की तरह इस बार भी होलिका दहन को भव्य रूप दिया गया है, लेकिन चंद्र ग्रहण के कारण तिथि को लेकर भ्रम की स्थिति बनी है। बावजूद इसके, उत्साह में कोई कमी नहीं है और लोग पूरे जोश के साथ रंगों के इस पर्व का इंतजार कर रहे हैं।

होली का उत्सव चरम पर

काशी में होली का उत्साह चरम पर है। शहर के विभिन्न इलाकों में होलिका सज चुकी है और लोग विधि-विधान से पूजन की तैयारियों में जुटे हैं। इसी क्रम में अस्सी घाट पर भी होलिका को भव्य रूप से सजाया गया है, जो श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

उपलों से तैयार इको-फ्रेंडली होलिका

अस्सी घाट पर इस बार होलिका को विशेष रूप से इको-फ्रेंडली स्वरूप दिया गया है। होलिका को लकड़ियों के बजाय उपलों (गोबर के कंडों) के ऊपर स्थापित किया गया है। आयोजन समिति के अनुसार इसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना और परंपरा को प्रकृति के अनुकूल रूप में निभाना है।

गोबर के उपलों से तैयार होलिका न केवल पारंपरिक स्वरूप को दर्शाती है, बल्कि इससे प्रदूषण भी अपेक्षाकृत कम होता है। स्थानीय लोगों ने इस पहल की सराहना की है।

सजावट और सुरक्षा के इंतजाम

होलिका को फूल-मालाओं और रंग-बिरंगी सजावट से संवारा गया है। चारों ओर सुरक्षा के लिए घेरा बनाया गया है ताकि दहन के समय कोई अनहोनी न हो। घाट पर साफ-सफाई और व्यवस्थाओं का भी विशेष ध्यान रखा जा रहा है।

दहन के बाद शुरू होगा होली उत्सव

अस्सी घाट पर हर वर्ष होलिका दहन बड़े ही धूमधाम से किया जाता है। वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक विधि-विधान के साथ होलिका जलाई जाती है। दहन के बाद लोग एक-दूसरे को गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं देते हैं।

यहां स्थानीय निवासियों के साथ-साथ देश-विदेश से आए पर्यटक भी इस आयोजन का हिस्सा बनते हैं। घाट पर ढोल-नगाड़ों की थाप, होली के गीत और उत्सव का माहौल देर रात तक बना रहता है। काशी में आस्था, परंपरा और पर्यावरण संरक्षण का यह सुंदर संगम अस्सी घाट की होलिका को इस वर्ष भी खास बना रहा है।

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