खोजवां नई बाजार चुंगी में कलश स्थापना से लेकर हवन और कन्या पूजन तक निभाई जाती है परंपरा, सुबह-शाम होती है माता की आरती
वाराणसी। धर्म और आस्था की नगरी काशी में नवरात्रि का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इसी क्रम में वाराणसी के खोजवां नई बाजार चुंगी क्षेत्र में गीता देवी के घर वर्ष 1994 से मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है। हर वर्ष शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों तक यहां विधि-विधान से माता की आराधना की जाती है। परिवार के सदस्य पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-पाठ, आरती और भोग की परंपरा का निर्वहन करते हैं।
कलश स्थापना के साथ शुरू होती है पूजा-अर्चना
नवरात्रि के पहले दिन शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना कर मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है। इसके साथ ही अखंड ज्योति प्रज्वलित कर नौ दिनों तक पूजा-अर्चना का क्रम शुरू होता है। प्रतिदिन सुबह और शाम माता की आरती की जाती है। गणेश वंदना के साथ मां दुर्गा के मंत्रों का जाप किया जाता है। माता को चुनरी और श्रृंगार की सामग्री अर्पित की जाती है।

नौ दिनों तक माता के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना
नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। प्रत्येक दिन माता को श्रद्धानुसार विभिन्न प्रकार के भोग अर्पित किए जाते हैं। इसमें खीर, पूरी, हलवा, फल और मेवे सहित अन्य प्रसाद शामिल होते हैं। पूजा के दौरान घर में भक्तिमय वातावरण बना रहता है और परिवार के सदस्य माता का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए विधि-विधान से अनुष्ठान करते हैं।
अष्टमी या नवमी को होता है हवन और कन्या पूजन
नवरात्रि के अंतिम चरण में अष्टमी या नवमी तिथि पर हवन और कन्या पूजन किया जाता है। कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है। उन्हें भोजन और प्रसाद खिलाकर आशीर्वाद लिया जाता है। इस प्रकार नौ दिनों तक चलने वाली पूजा का समापन श्रद्धा और भक्ति के साथ होता है।

तीन दशक से अधिक समय से निभाई जा रही धार्मिक परंपरा
खोजवां नई बाजार चुंगी स्थित गीता देवी के घर वर्ष 1994 से चली आ रही यह धार्मिक परंपरा आस्था, संस्कार और माता के प्रति समर्पण का प्रतीक है। नवरात्रि के अवसर पर की जाने वाली पूजा-अर्चना परिवार में धार्मिक परंपराओं को बनाए रखने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है।
नवरात्रि के दौरान पूजा-पाठ, आरती, भोग, हवन और कन्या पूजन जैसे धार्मिक अनुष्ठान परिवार की दिनचर्या का हिस्सा बन जाते हैं। यह परंपरा नई पीढ़ी को धार्मिक रीति-रिवाजों और पारिवारिक संस्कारों से जोड़ने का माध्यम भी है। मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा और समर्पण के साथ वर्ष 1994 से चली आ रही यह पूजा आज भी विधि-विधान से की जा रही है।
