रिपोर्ट: गोपी गुप्ता 

वाराणसी। धर्म और संस्कृति की नगरी काशी में अपनी प्राचीन परंपराओं के लिए प्रसिद्ध खोजवां बाजार की नक्कटैया आज भी लोगों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। भेलूपुर क्षेत्र के गांधी चौक, खोजवां में आयोजित होने वाला यह ऐतिहासिक धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन 110 वर्षों से अधिक समय से चला आ रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, नक्कटैया के दौरान लाखों की संख्या में लोग पहुंचते हैं। इस दौरान पूरा क्षेत्र धार्मिक उत्साह, पारंपरिक कला और मेले की रौनक से सराबोर हो जाता है।

खोजवां की नक्कटैया केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि काशी की सांस्कृतिक विरासत और लोक परंपराओं की पहचान भी है। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में रामायण के प्रसंगों को झांकियों और पारंपरिक प्रदर्शनों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। आयोजन में स्थानीय कलाकारों की मेहनत, पारंपरिक लाग-विमान और बनारसी नगाड़ों की गूंज दर्शकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहती है।

रामायण के प्रसंग पर आधारित है नक्कटैया का आयोजन

खोजवां बाजार की नक्कटैया का संबंध रामायण के उस प्रसंग से है, जिसमें भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के दौरान पंचवटी में निवास करते हैं। इसी दौरान राक्षसी शूर्पणखा भगवान श्रीराम के सामने विवाह का प्रस्ताव रखती है। इसके बाद लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा की नाक काटे जाने का प्रसंग सामने आता है। इसी घटना को नक्कटैया की परंपरा का मुख्य आधार माना जाता है।

आयोजन के दौरान रामायण से जुड़े प्रसंगों को विभिन्न झांकियों और पारंपरिक प्रस्तुतियों के माध्यम से दर्शाया जाता है। पात्रों की वेशभूषा, आकर्षक दृश्य और पारंपरिक सजावट धार्मिक कथा को जीवंत रूप देने का प्रयास करते हैं। रात में निकलने वाले जुलूस में शामिल झांकियां दर्शकों का ध्यान आकर्षित करती हैं। बड़ी संख्या में लोग इस आयोजन को देखने के लिए पहुंचते हैं और देर रात तक मेले का माहौल बना रहता है।

लाग-विमान और आकर्षक झांकियां बनती हैं आकर्षण का केंद्र

खोजवां की नक्कटैया में लाग-विमानों का विशेष महत्व है। स्थानीय कलाकार अपनी कला, कल्पनाशीलता और मेहनत से विभिन्न प्रकार की झांकियां तैयार करते हैं। इन प्रस्तुतियों में धार्मिक प्रसंगों के साथ सामाजिक विषयों को भी स्थान दिया जाता है। यही वजह है कि नक्कटैया का आयोजन धार्मिक आस्था के साथ लोककला और सामाजिक चेतना से भी जुड़ा हुआ है।

जुलूस के दौरान बनारसी नगाड़ों की गूंज, झांकियों की सजावट और दर्शकों का उत्साह आयोजन की रौनक बढ़ा देता है। आसपास के मोहल्लों के लोग इस परंपरा से लंबे समय से जुड़े हुए हैं। वहीं, दूसरे क्षेत्रों से आने वाले लोग भी इसे काशी की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के रूप में देखते हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार, समय के साथ आयोजन के स्वरूप में बदलाव आया है, लेकिन इसके प्रति लोगों की आस्था और उत्साह आज भी बना हुआ है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा स्थानीय समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

धार्मिक परंपरा के साथ सामाजिक संदेश भी देती हैं झांकियां

खोजवां बाजार की नक्कटैया की खासियत यह है कि इसमें धार्मिक प्रसंगों के मंचन के साथ सामाजिक संदेशों को भी प्रस्तुत करने की परंपरा रही है। विभिन्न झांकियों के माध्यम से समाज से जुड़े विषयों को सामने लाने का प्रयास किया जाता है। इससे दर्शकों को धार्मिक और सांस्कृतिक मनोरंजन के साथ सामाजिक मुद्दों पर विचार करने का अवसर भी मिलता है।

काशी में रामलीला और उससे जुड़ी परंपराएं लंबे समय से जनजीवन का हिस्सा रही हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में आयोजित होने वाले धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम स्थानीय पहचान और सामूहिक सहभागिता को मजबूत करते हैं। खोजवां की नक्कटैया भी इसी परंपरा का हिस्सा है, जिसमें कलाकारों, आयोजकों और स्थानीय लोगों की भागीदारी महत्वपूर्ण रहती है।

इस आयोजन के माध्यम से नई पीढ़ी को भी रामायण के प्रसंगों, पारंपरिक कला और काशी की सांस्कृतिक विरासत से परिचित होने का अवसर मिलता है। धार्मिक कथा को झांकियों और पारंपरिक प्रस्तुतियों के जरिए सामने लाने से यह परंपरा लोगों के बीच अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।

110 वर्षों से अधिक समय से कायम है नक्कटैया की पहचान

गांधी चौक, खोजवां में आयोजित होने वाली नक्कटैया 110 वर्षों से अधिक समय से काशी की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक बनी हुई है। इस आयोजन में उमड़ने वाली भीड़, पारंपरिक लाग-विमान, झांकियां और बनारसी नगाड़ों की गूंज इसकी विशिष्ट पहचान हैं।

स्थानीय लोगों के सहयोग और कलाकारों की मेहनत से यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है। नक्कटैया काशी की उन सांस्कृतिक परंपराओं में शामिल है, जो धार्मिक आस्था के साथ लोककला और सामाजिक सहभागिता को भी जोड़ती हैं। यही वजह है कि खोजवां बाजार की नक्कटैया आज भी वाराणसी के प्रमुख पारंपरिक आयोजनों में अपनी अलग पहचान रखती है।

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